गोपी गीत - जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः

देवी चित्रलेखा
श्री कृष्ण भजन भजन देवी चित्रलेखा
॥ दोहा ॥

श्री मद्भागवत पंचम अध्याय, गोपी विरह अपार।
देवी चित्रलेखा गावती, प्रेम सुधा रस धार॥

॥ चौपाई ॥

जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावकास्त्वयि धृतासवास्त्वां विचिन्वते॥

शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः॥

विषजलाप्ययाद्व्यालराक्षसाद्वर्षमारुताद्वैद्युतानलात्।
वृषमयात्मजाद्विश्वतो भयादृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः॥

न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान्सात्वतां कुले॥

विरचिताभयं वृष्णिधूर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात्।
करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्॥

सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम्।
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽमृताधरम्॥

अति सुकोमलं चरणमम्बुजं स्तनतटेषु नः संशनैः शनैः।
अटवि विचरसि पंकिलैः पदैर्व्यथति धीर्नः किं न वल्लभ॥

तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमंगलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥

॥ दोहा ॥

गोपिन के विरह वेदना, हरहु कुंजबिहार।
देवी चित्रलेखा वंदन करे, जय जय नन्दकुमार॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भागवत महापुराण के रासपंचाध्यायी का दिव्य गोपी गीत, जिसे पूज्य देवी चित्रलेखा जी अपनी कथाओं में अत्यंत भाव-विभोर होकर गाती हैं। विरह व्याकुल गोपियाँ अपने प्राणनाथ श्री कृष्ण से पुनः प्रकट होकर अमृत रूपी दर्शन देने की याचना करती हैं।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।