ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल hoy॥
भस्म अंग पर शोभित सोहे, नंदी की असवारी।
पार्वती संग राजत गिर पर, त्रिपुरारी सुखकारी॥
विष प्याला पी जग को तारा, नीलकंठ कहलाए।
दीन दुखियन पर दया करत नित, शिव शंकर मन भाये॥
नाम जपे से पाप नशावे, जन्म मरण के फेर मिटावे।
संतन के संग मन रंग लीजै, जीवन सफल बनावे॥
जटा जूट में गंगा सोहे, भाल तिलक शशि चंदा।
गले सर्प की माला चमके, मेटत भव के फंदा॥
डम डम डमरू बाजत भारी, नाचत नटराज धीर।
चरण शरण में आयो सेवक, हरो हमारी पीर॥
कहे रविदास खलास चमारा, जो परसै हरि चरण।
जाके घट में प्रेम बसे है, ताको प्रभु की शरण॥