गंगा से गंगाजल भरक

पारंपरिक
महादेव भजन Bhajan Shiv Bhajan
॥ पावन पाठ ॥

गंगा से गंगाजल भरके,

काँधे शिव की कावड़ धरके,

भोले के दर चलो लेके कावड़ चलो,

भोले के दर चलो लेके कावड़ चलो ॥

सावन महीने का पावन नजारा,

अद्भुत अनोखा है भोले का द्वारा,

सावन की जब जब है बरसे बदरिया,

सावन की जब जब है बरसे बदरिया,

झूमे नाचे और बोले कावड़िया,

भोले के दर चलो लेके कावड़ चलो,

भोले के दर चलो लेके कावड़ चलो ॥

रस्ता कठिन है और मुश्किल डगर है,

भोले के भक्तो को ना कोई डर है,

राहों में जितने भी हो कांटे कंकर,

राहों में जितने भी हो कांटे कंकर,

हर एक कंकर में दीखते है शंकर,

भोले के दर चलो लेके कावड़ चलो,

भोले के दर चलो लेके कावड़ चलो ॥

कावड़ तपस्या है भोले प्रभु की,

ग्रंथो ने महिमा बताई कावड़ की,

होंठो पे सुमिरन हो पेरो में छाले,

होंठो पे सुमिरन हो पेरो में छाले,

‘रोमी’ तपस्या हम फिर भी कर डाले,

भोले के दर चलो लेके कावड़ चलो,

भोले के दर चलो लेके कावड़ चलो ॥

गंगा से गंगाजल भरके,

काँधे शिव की कावड़ धरके,

भोले के दर चलो लेके कावड़ चलो,

॥ दोहा ॥

भोले के दर चलो लेके कावड़ चलो ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।