गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
सप्त अश्व रथ पर असवारी, अरुण सारथी आगे।
उदित भानु जब तिमिर नशावे, सकल जीव सब जागे॥
तेज पुंज आदित्य दिवाकर, नमन करत संसारा।
आरोग्य धन वैभव दीजो, प्रभु तुम प्राण अधारा॥
दीन दयाल कृपालु स्वामी, घट घट के तुम अंतर्यामी।
हाथ जोड़ कर शीश नवाऊँ, हरो कलेश त्रिपुरारी॥
ॐ सूर्याय नमः मंत्र जपते, मिटत असाध्य कलेश।
भक्ति भाव से जो जल अर्पे, पावत सुख अशेष॥
प्रत्यक्ष देव भुवन के स्वामी, भास्कर ज्योति अपारा।
कोटि कोटि वंदन हे दिनकर, सब जग का उजियारा॥
नानक नाम जहाज है, चढ़े सो उतरे पार।
जो सरधा कर सेवदे, तिन भवजल तारणहार॥