सविता देव - अर्घ्य समर्पण वंदना स्तुति

मीरा बाई
सूर्य देव भजन भजन सूर्य देव
॥ दोहा ॥

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

॥ चौपाई ॥

सप्त अश्व रथ पर असवारी, अरुण सारथी आगे।
उदित भानु जब तिमिर नशावे, सकल जीव सब जागे॥
तेज पुंज आदित्य दिवाकर, नमन करत संसारा।
आरोग्य धन वैभव दीजो, प्रभु तुम प्राण अधारा॥

दीन दयाल कृपालु स्वामी, घट घट के तुम अंतर्यामी।
हाथ जोड़ कर शीश नवाऊँ, हरो कलेश त्रिपुरारी॥

ॐ सूर्याय नमः मंत्र जपते, मिटत असाध्य कलेश।
भक्ति भाव से जो जल अर्पे, पावत सुख अशेष॥
प्रत्यक्ष देव भुवन के स्वामी, भास्कर ज्योति अपारा।
कोटि कोटि वंदन हे दिनकर, सब जग का उजियारा॥

॥ दोहा ॥

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरहु कलेश हमार।
चरण कँवल की दासी मीरा, तारो भवजल पार॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

भक्त शिरोमणि मीरा बाई का यह अनन्य प्रेम पद सांसारिक बंधनों से मुक्ति और प्रभु गिरधर के चरणों में पूर्ण समर्पण का संदेश देता है। इस पावन भजन में सूर्य देव के अंधकार नाशक स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।