धर्मराज आरती - ॐ जय धर्म धुरन्धर (Dharmraj Ki Aarti - Om Jai Dharm Dhurandar)

संत तुलसीदास
विष्णु भगवान आरती Aarti Dharmraj Aarti
॥ पावन पाठ ॥

ॐ जय जय धर्म धुरन्धर,

जय लोकत्राता ।

धर्मराज प्रभु तुम ही,

हो हरिहर धाता ॥

जय देव दण्ड पाणिधर यम तुम,

पापी जन कारण ।

सुकृति हेतु हो पर तुम,

वैतरणी ताराण ॥2॥

न्याय विभाग अध्यक्ष हो,

नीयत स्वामी ।

पाप पुण्य के ज्ञाता,

तुम अन्तर्यामी ॥3॥

दिव्य दृष्टि से सबके,

पाप पुण्य लखते ।

चित्रगुप्त द्वारा तुम,

लेखा सब रखते ॥4॥

छात्र पात्र वस्त्रान्न क्षिति,

शय्याबानी ।

तब कृपया, पाते हैं,

सम्पत्ति मनमानी ॥5॥

द्विज, कन्या, तुलसी,

का करवाते परिणय ।

वंशवृद्धि तुम उनकी,

करते नि:संशय ॥6॥

दानोद्यापन-याजन,

तुष्ट दयासिन्धु ।

मृत्यु अनन्तर तुम ही,

हो केवल बन्धु ॥7॥

धर्मराज प्रभु,

अब तुम दया ह्रदय धारो ।

जगत सिन्धु से स्वामिन,

सेवक को तारो ॥8॥

धर्मराज जी की आरती,

जो कोई नर गावे ।

धरणी पर सुख पाके,

॥ दोहा ॥

मनवांछित फल पावे ॥9॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

धर्मराज आरती - ॐ जय धर्म धुरन्धर | Dharmraj Ki Aarti - Om Jai Dharm Dhurandar

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।