धनवानों का मान है जग में..

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

धनवानों का मान है जग में,

निर्धन का कोई मान नहीं ।

ए मेरे भगवन बता दे,

निर्धन क्या इन्सान नहीं ॥

पास किसी के हीरे मोती,

पास किसी के लंगोटी है ।

दूध मलाई खाए कोई,

कोई सूखी रोटी है ।

मुझे पता क्या तेरे राज्य में,

निर्धन का सम्मान नहीं ॥

धनवानों का मान है जग में,

निर्धन का कोई मान नहीं ।

ए मेरे भगवन बता दे,

निर्धन क्या इन्सान नहीं ॥

एक को सुख साधन,

फिर क्यों एक को दुःख देते हो ।

नंगे पाँव दौड़ लगाकर,

खबर किसी की लेते हो ।

लोग कहे भगवन तुझे,

पर में कहता भगवन नहीं ॥

धनवानों का मान है जग में,

निर्धन का कोई मान नहीं ।

ए मेरे भगवन बता दे,

निर्धन क्या इन्सान नहीं ॥

भक्ति करे जो तेरी वो,

बैतरनी को तर जाये ।

जो न सुमरे तुम्हे,

भंवर के जाल में वो फस जाये ।

पहले रिश्वत लिए तो तारे,

क्या इसमें अपमान नहीं ॥

धनवानों का मान है जग में,

निर्धन का कोई मान नहीं ।

ए मेरे भगवन बता दे,

निर्धन क्या इन्सान नहीं ॥

तेरी जगत की रित में है क्या,

हो जग के रखवाले ।

दे ना सको अगर सुख का साधन,

तो मुजको तू बुलवाले ।

अर्जी तेरे है बच्चो की,

तू भी तो अनजान नहीं ॥

धनवानों का मान है जग में,

निर्धन का कोई मान नहीं ।

ए मेरे भगवन बता दे,

॥ दोहा ॥

निर्धन क्या इन्सान नहीं ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।