॥ दोहा ॥
मनिहारी का भेष बनाय के, आयो ब्रज की खोरी।
छलिया चूड़ी बेचत डोले, देखत रूप किशोरी॥
॥ चौपाई ॥
छलिया का भेष बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया।
छलिया का भेष बनाया॥
राधा जी के महल में पहुंचे, आवाज लगाई प्यारी।
चूड़ी ले लो चूड़ी ले लो, कान्हा बने मनिहारी॥
लाल हरी पीली चूड़ियां, सुंदर रूप सजाया।
हाथ पकड़ जब चूड़ी पहराई, मन ही मन मुस्काया॥
राधा ने जब रूप पहचाना, प्रेम मगन हो ध्याया।
छलिया का भेष बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
॥ दोहा ॥
लीलाधारी मोहन की यह, लीला अति सुखदाई।
मनिहारी बन राधा को, अपने रंग रंगाई॥