छलिया का भेष बनाया श्याम चूड़ी बेचने आया

साध्वी पूर्णिमा जी (पूनम दीदी)
श्री कृष्ण भजन भजन साध्वी पूर्णिमा
॥ दोहा ॥

मनिहारी का भेष बनाय के, आयो ब्रज की खोरी।
छलिया चूड़ी बेचत डोले, देखत रूप किशोरी॥

॥ चौपाई ॥

छलिया का भेष बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया।
छलिया का भेष बनाया॥

राधा जी के महल में पहुंचे, आवाज लगाई प्यारी।
चूड़ी ले लो चूड़ी ले लो, कान्हा बने मनिहारी॥

लाल हरी पीली चूड़ियां, सुंदर रूप सजाया।
हाथ पकड़ जब चूड़ी पहराई, मन ही मन मुस्काया॥

राधा ने जब रूप पहचाना, प्रेम मगन हो ध्याया।
छलिया का भेष बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥

॥ दोहा ॥

लीलाधारी मोहन की यह, लीला अति सुखदाई।
मनिहारी बन राधा को, अपने रंग रंगाई॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

भगवान श्री कृष्ण द्वारा मनिहारी (चूड़ी बेचने वाले) का रूप धारण कर श्री राधा के महल में जाकर चूड़ी पहनाने की यह ब्रज लीला का अत्यंत मनोरम रसिया भजन है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।