चली जा रही है उमर धीरे धीरे

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

चली जा रही है उमर धीरे धीरे,

पल पल यूँ आठों पहर धीरे धीरे,

चली जा रही हैं उमर धीरे धीरे,

जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे,

मिल जाएगा वो सजन धीरे धीरे ॥

बचपन भी जाए जवानी भी जाए,

बुढ़ापे का होगा असर धीरे धीरे,

मिल जाएगा वो सजन धीरे धीरे ॥

चली जा रही है उमर धीरे धीरे,

पल पल यू आठौँ पहर धीरे धीरे ॥

तेरे हाथ पावों में बल ना रहेगा,

झुकेगी तुम्हारी कमर धीरे धीरे,

मिल जाएगा वो सजन धीरे धीरे ॥

चली जा रही है उमर धीरे धीरे,

पल पल यू आठौँ पहर धीरे धीरे ॥

शिथिल अंग होंगे एक दिन तुम्हारे,

फिर मंद होगी नज़र धीरे धीरे,

मिल जाएगा वो सजन धीरे धीरे ॥

चली जा रही है उमर धीरे धीरे,

पल पल यू आठौँ पहर धीरे धीरे ॥

बुराई से मन को अपने हटाले,

सुधर जाए तेरा जीवन धीरे धीरे,

मिल जाएगा वो सजन धीरे धीरे ॥

चली जा रही है उमर धीरे धीरे,

पल पल यू आठौँ पहर धीरे धीरे ॥

चली जा रही है उमर धीरे धीरे,

पल पल यूँ आठों पहर धीरे धीरे,

चली जा रही हैं उमर धीरे धीरे,

जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे,

॥ दोहा ॥

मिल जाएगा वो सजन धीरे धीरे ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।