पतितपावनी माँ गंगा - शीतल लहर तरंग भजन

संत कबीर
माँ गंगा भजन भजन माँ गंगा
॥ दोहा ॥

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

॥ चौपाई ॥

शिव जटा से निकली गंगा, भगीरथ तप से आई।
सकल लोक का पाप बहाकर, मुक्ति धाम बनाई॥
शीतल पावन धार तुम्हारी, जो नर डुबकी लावे।
जन्म मरण के बंधन टूटे, परम पद सो पावे॥

दीन दयाल कृपालु स्वामी, घट घट के तुम अंतर्यामी।
हाथ जोड़ कर शीश नवाऊँ, हरो कलेश त्रिपुरारी॥

हरिद्वार काशी प्रयागराज, तट पर दीप उजाले।
आरती करत सकल संसारा, संकट सकल विडाले॥
जय माँ गंगे पावन मैया, निर्मल तोय तुम्हारा।
अंतिम काल शरण में लीजो, हे जीवन आधारा॥

॥ दोहा ॥

कहत कबीर सुनो भाई साधो, शब्द गहो चित लाय।
हरि सुमिरन बिन मुक्ति नाहीं, जनम अकारथ जाय॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संत कबीर का यह निर्गुण भजन बाह्य आडंबरों को त्यागकर अंतःकरण में सत्य, सत्संग और नाम सुमिरन की महिमा उजागर करता है। इस पावन भजन में माँ गंगा के अमृतमयी धार स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।