मेरी माँ ओ मेरी माँ

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॥ पावन पाठ ॥

तेरी ही ममता की आंचल में पला हु,

तेरे ही रहमो कर्म से जिन्दा हु

मेरी माँ ओ मेरी माँ,

तेरे एहसानो तले तो मैं दबा हु तेरे ही रहमो कर्म से जिन्दा हु,

मेरी माँ ओ मेरी माँ,

तेरी ऊँगली पकड़ कर सीखा है मैंने चलना,

तेरी आँखों से मैंने देखा है मैंने ये जहान,

तू ही धर्म मेरा तू ही कर्म मेरा तू ही मेरा जीना मरणा,

तेरी सेवा में जीवन मेरा बीते अब यही है मुझको करना,

मेरी ये सांसे तुम्हारी अमानत है मेरा ये जीवन है तेरा,

मैं ना चाहु दौलत न चाहु शोरत माँ तू ही तो सब कुछ है मेरा,

मेरी माँ ओ मेरी माँ,

मैंने देखा नहीं है कैसे होते है भगवान्,

मैं तो बस जानता हु तुम से है मेरी पहचान,

तू ही मेरा कृष्णा तू ही मेरी राधा तू ही मेरी गंगा मइया,

तेरे ही हाथो में मेरी ये नैया है तू ही है मेरी खवइयाँ,

फिर से तेरी गॉड में सोना चाहु मैं फिर से वो लोरी सुना दे,

बचपन की वो यादे कैसे भुलाऊ माँ फिर से वो यादे जगा दे,

मेरी माँ ओ मेरी माँ,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।