खाली न मोड़ी वे जोगियाँ मैं दर आ गी तेरे,

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

खाली न मोड़ी वे जोगियाँ मैं दर आ गी तेरे,

चोली खैरा पावी वे जोगियाँ मैं दर आ गी तेरे,

खाली न मोड़ी वे जोगियाँ मैं दर आ गी तेरे,

तेरे बिन कोई होर नहीं मेरा जोगियाँ आ पल्ला फड़ लिया तेरा,

ना मुख मेतो मोड़ी वे जोगियाँ मैं दर आ गई तेरा,

खाली न मोड़ी वे जोगियाँ मैं दर आ गी तेरे,

जोगी जोगी करदी आ मैं नाम तेरे नाल तर्दी आ,

मैं ना अध् विच छोड़ी वे जोगियाँ मैं दर आगि तेरे,

खाली न मोड़ी वे जोगियाँ मैं दर आ गी तेरे,

दुखियारी नू चरनी लावी सुते मेरे बरम जगावी,

ना लाइ देरी वे जोगियाँ मैं दर आ गई तेरे,

खाली न मोड़ी वे जोगियाँ मैं दर आ गी तेरे,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।