मेरे मन विच मीह बरसादे

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॥ पावन पाठ ॥

मेरे मन विच मीह बरसादे रेहमता दा तू मालका,

मैनु अन्न हद नाल सुना दे चौरासी मुके मेरे मालका,

मेरे मन विच मीह बरसादे रेहमता दा तू मालका,

दिने चढ़े सूरज ते राति चढ़े चन बई,

लोह विच रहे मेरा हर वेले मन बाई,

मेरी सूरत ठिकाने ते बिठा दे हर वेले मेरे मालका,

मेरे मन विच मीह बरसादे रेहमता दा तू मालका,

अठे पैर तेरा साहनु शब्द सुनाई हॉवे,

मथे विच मेरे दाता खुदा दी खुदाई हॉवे,

मेरा दसवा द्वार खुल जावे,दया कर मेरे मालका,

मेरे मन विच मीह बरसादे रेहमता दा तू मालका,

कपिल दी सुध भुध रहे तेरी लोह विच तुरे फिरे,

जग विच रहे तेरी छा विच,

तेरे चरना च था मिले साहनु अंत वेले मेरे मलका,

मेरे मन विच मीह बरसादे रेहमता दा तू मालका,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।