आ ले पी ले कमण्डली अमृत दी

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

जग विच हॉवे चर्चा नाथ दे जत सत दी ,

आ ले पी ले कमण्डली अमृत दी,

पी ले पी ले कमण्डली अमृत दी,

भगता एह है अमृत ऐसा तन मन शीतल करदा,

ऐब गुना भी बक्श बंदे दे जीवन विच रंग भरदा,

अपने मनन वाले दी करे रख्या पदवी,

आ ले पी ले कमण्डली अमृत दी,

इस अमृत नु पी सुधर गये पापी ते अपराधी,

सिद्ध जोगी दा नाम जपन ले बह गये मार समाधि,

वेखि ढोल न जावे परखेया तेरी मत भी,

आ ले पी ले कमण्डली अमृत दी,

इस विच रस है भगति वाला कटे गेहड़ चौरासी ,

एह नाथा दी सेवा दा फल करदा दूर उदासी,

तर जावे जींद चरखा जो भी नाम दा कट दी,

आ ले पी ले कमण्डली अमृत दी,

अमृत इस कमण्डली दा तू पी सारे दा सारा,

हर वेले तेरे नाल है जोगी वीरका दे बलिहारा,

सच्चे मार्ग चल के मंग भली सर भत दी,

आ ले पी ले कमण्डली अमृत दी,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।