चल साई के द्वार

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

चल साई के द्वार,

साई भाग्येविद्याता उसकी महिमा अप्रमपार,

नैना मेरे भर आये शिरडी कोई ले जाये,

कोई तो मेरा अरमान निकले साई के दर्शन पाये,

चल आ चल आ मैं साथ हु तेरे,

साई कहते है तुझसे बार बार,

चल साई के द्वार,

दर्द सहा न जाये साई गले से लगाए,

साई की मैं हु पुजारन दिल मेरा भर आये,

साई की ऐसी लग्न लगी है मन करे हाये हाये,

चल आ चल आ मैं साथ हु तेरे,

साई कहते है ये सब से बार बार,

चल साई के द्वार,

जो गुजारी है मुझपे साई तुझे सब पता है,

साई से नैन लड़े गे दर्द का तू ही आसारा है ,

जिस ने दिल से तुझको पुकारा साई ने दिया है सहारा,

चल आ चल आ मैं साथ हु तेरे,

साई कहते है ये सबसे बार बार,

चल साई के द्वार,

साई मेरा है मुकदर कहता है सूफी हमसर,

साई ने इतना दिया है कतरे को किया है समंदर,

साई जैसा कोई नहीं है दुनिया में ऐसा रेहभर,

चल आ चल आ मैं साथ हु तेरे,

साई कहते है ये हमसे बार बार,

चल साई के द्वार,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।