न करो बंदगी न करो इबादत

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॥ पावन पाठ ॥

न करो बंदगी न करो इबादत,

इक दूजे दे नाल प्यार करो इक दूजे दा सत्कार करो,

सब तो वडी है पूजा है सब तो बड़ा एह सजदा है एहो मेरा सतगुरु कहंदा है,

एहो मेरा दाता कहंदा है,

बन्दा बंदे दे कम आवे भावे ओ माला फेरे न,

दुखियां दी सेवा करदा रहे भावे आवे दर मेरे न,

जो सब ले खैरा मंगदा है सब नाल भलाई करदा है,

दिल विच मेरे ओ वसदा है,

न करो बंदगी न करो इबादत

नफरत दी खेती करदे जो नफरत दा ही फल चख दे ने,

एहो दस्त्रुर क्दरत दा जो भीज्दे ने ओह ही कट दे ने,

किकरा ते अम्ब नही लगदे पत्थर पनियां ते नही तर दे,

अंजाम बुरे ने बुरेया दे

न करो बंदगी न करो इबादत ...

तू पंज नमाजी कहलावी जा मथे तिलक सजावी तू,

गिरजा घर विच कैंडल वाले या नित गुरुद्वारे जावे तू,

दिल साफ़ जे तेरा नही साहिल फिर कुछ भी नही होना हासिल,

कुज सोच विचार तू एह गाफिल

न करो बंदगी न करो इबादत ....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।