मेला शाहतलाइयाँ दा आज दुनिया देखन आई

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॥ पावन पाठ ॥

शाहतलाइयाँ हेठ बोहड़ ते बैठा आसान लाई,

भोली तार दे गुफा निराली जिथे झुके लुगाई,

मेला पौणाहारी दा आज दुनिया देखन आई,

सोहने रंगियां सजन जटावा मोर सवारी सज दी,

तन दे उते बसम रमाई सोनी सूरत लग दी,

हाथ जोगी दे चिम्टा सजदा सिंघी गल विच पाई,

मेला पौणाहारी दा आज दुनिया देखन आई,

लखा ही शरदालु आके शीश निभांदे दर ते,

मनोकामना हो जे पूरी दर्श जोगी दा करके,

डूबदे वेहड़े बने लावे जिसने ओट टकाई,

मेला शाहतलाइयाँ दा आज दुनिया देखन आई,

झंडे झुल्दे गुफा दे उते दुरो पैन चमकारे,

ढोल नगाड़े बज दे हर दम दर दे अजब नजारे,

दूर दूर तो संगत चल के दरबार ते आई,

मेला शाहतलाइयाँ दा आज दुनिया देखन आई,

पौनहारियाँ आ भगता नु दर्श दिखा इक वारि,

गल विच कपड़ा पा के तेरे आगे अर्ज गुजारी,

जरनैल राय ने भी संगत दे विच गाई,

मेला शाहतलाइयाँ दा आज दुनिया देखन आई,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।