जीहदे साइयाँ दी झंजर पै जंदी

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॥ पावन पाठ ॥

जीहदे साइयाँ दी झंजर पै जंदी,

ओ फ इको जोगी रह जंदी,

ओह रूह फिर दर दर भज दी न,

पका मल ठिकाना बह जांदी

एह पैरी झांजर क्यों पेंदी,

जन्मा दे सुते जगाउन लई,

हथा ते मेहँदी क्यों लगदी लेखा ते रंग चढाउन लई,

अखा विच कजल क्यों पेंदा अकला तो पर्दे लाऊँ लई,

जदो नजरियां बदल जंदा दुनिया दी बदल हर शह जांदी,

जीहदे साइयाँ दी झंजर पै जंदी......

जो सैया दी चौकठ ते गुजरे बस ओहि पल अनमुल्ले ने,

जेहड़ा ओहदे नाम दी पी लेंदा ओहनू जाम जहान दे भूले ने,

इस झंजार सदका ही रुसया जी पीर मनाया भूले ने,

ओह हस्ती मस्ती च खो जांदी हर ताना हस के सह जांदी,

जीहदे साइयाँ दी झंजर पै जंदी,

किथे बे गुरेया दी गति नही एह कहन्दी दुनिया सारी है,

जिहदे सिर दा कोई साईं नही हो जन्दी रूह दुर्कारी है,

भावे लख सिकंदर हॉवे कोई इथे सब ने बाजी हारी है,

सुखबीर सदा न चडी रेह्न्दी इक दिन ता गुडी लेह जन्दी,

जीहदे साइयाँ दी झंजर पै जंदी,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।