मेरी अर्ज कबूल करि

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॥ पावन पाठ ॥

तेरी करा इबादत मैं मैनु किथे तक साइयाँ,

मेरी अर्ज कबूल करि मेरे परदे कज साइयाँ,

धन दौलत भी तेरी शोहरत भी तेरी है,

की मान करा तन दा एह राख दी ढेरी है,

मेरा काबा काशी तू ते तू हियो हज साइयाँ,

मेरी अर्ज कबूल करि मेरे परदे कज साइयाँ,

जग ने ठुकराया है पर तू ठुकरावीं न,

अपने भी भूल गए ने पर तू भूल जावी ना,

हाथ जोड़ खड़ा दर ते लावी न पज साइयाँ,

मेरी अर्ज कबूल करि मेरे परदे कज साइयाँ,

तेरे ना लिख दिति मैं दिल वाली अर्जी ये,

रख ले या मार दवी हूँ तेरी मर्जी है,

तेरी चरनी ला दिति एह ज़िंदगी आज साइयाँ,

मेरी अर्ज कबूल करि मेरे परदे कज साइयाँ,

कुज होर न मंगा मैं मेरी मूक जावे,

जन्मा दी फेरी को मेरा दास छूट जावे,

ला चरनी सागर न आ जावे रज साइयाँ,

मेरी अर्ज कबूल करि मेरे परदे कज साइयाँ,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।