मैं मश्ली दरयावा दी

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

मैं मश्ली दरयावा दी पौणाहारी तारे ता तर्दी आ,

मैं पानी दे विच रह के भी बाबे दा सिमरन करदी हां,

मैं मश्ली दरयावा दी पौणाहारी तारे ता तर्दी आ,

तेरे मोरा दी जद आवाज सुने मैनु लगदा बाबा आउ होने,

लेजा नाल सिंघ्या वालेया वे,

अक़्ली दा न कोई दर्दी आ,

मैं मश्ली दरयावा दी पौणाहारी तारे ता तर्दी आ,

तेरी पौन दे पैन हुलारे वे तेरे दुभदे लगने किनारे वे,

तेरे धुनें दा कद निगह मिलु मैं पानी दे विच ठरदी आ,

मैं मश्ली दरयावा दी पौणाहारी तारे ता तर्दी आ,

तेरे चल के गुफा ते आवा मैं,

तेरा रज के दर्शन पावा मैं ,

तेरे दर दी गोली बनगी आ,

आवा बाहर पानी को मरदी आ,

मैं मश्ली दरयावा दी पौणाहारी तारे ता तर्दी आ,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।