बच्चे मन के सच्चे

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॥ पावन पाठ ॥

बच्चे मन के सच्चे सारी जग के आँख के तारे,

ये वो नन्हे फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे,

खुद रूठे, खुद मन जाये, फिर हमजोली बन जाये,

झगड़ा जिसके साथ करें,अगले ही पल फिर बात करें.

इनकी किसी से बैर नहीं, इनके लिये कोई ग़ैर नहीं,

इनका भोलापन मिलता है,

सबको बाँह पसारे बच्चे मन के सच्चे ...

इन्सान जब तक बच्चा है, तब तक समझ का सच्चा है,

यु यु उसकी उमर बढ़े,मन पर झूठ क मैल चढ़े,

क्रोध बढ़े, नफ़रत घेरे, लालच की आदत घेरे,

बचपन इन पापों से हटकर अपनी उमर गुज़ारे,

बच्चे मन के सच्चे ...

तन कोमल मन सुन्दर हैं बच्चे बड़ों से बेहतर है.

इनमें छूत और छात नहीं, झूठी जात और पात नहीं,

भाषा की तक़रार नहीं,मज़हब की दीवार नहीं,

इनकी नज़रों में एक हैं, मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे

बच्चे मन के सच्चे ...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।