बैठे साज धज के बाबा

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

बैठे सज धज के बाबा और मंद मंद मुसकाएँ,

आओ नज़र उतारें बाबा की, भक्तों की नज़र ना लग जाए,

बैठे सज धज के बाबा और मंद मंद मुसकाएँ,

कोई काजल डिब्बी ले आओ, साईं को टीका लगा जाओ,

ऐसे सुंदर – सुंदर मुखड़े को, शीशे की नज़र ना लग जाए,

बैठे सज धज के बाबा और मंद मंद मुसकाएँ

साईं का मुखड़ा भोला है, कफ़नी में चंदा लिपटा है,

ऐसे प्यारे प्यारे मुखड़े को, चंदा की नज़र ना लग जाए,

बैठे सज धज के बाबा और मंद मंद मुसकाएँ,

गिन गिन के पग जब रखते है, पैरों में घुंगरू बजते है,

तेरे सुंदर – सुंदर पैरों को, घुंगरू की नज़र ना लग जाए,

बैठे सज धज के बाबा और मंद मंद मुसकाएँ,

आओ नज़र उतारें बाबा की, भक्तों की नज़र ना लग जाए,

बैठे सज धज के बाबा और मंद मंद मुसकाएँ।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।