पोणाहारीया डोरां तेरे उते सूटीया

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॥ पावन पाठ ॥

पोणाहारीया डोरां तेरे उते सूटीया,

दुधारियाँ मौजा बढ़िया मैं लुटियाँ,

डोरा तेरे उते सुटियाँ मैं मौजा बहुत लुटियाँ,

पोणाहारीया डोरां तेरे उते सूटीया,

जो भी तेरी भगति करदा तू ते खली झोलियाँ भरदा,

झोली वालिया ते मैं भर भर मुठियाँ,

पोणाहारीया डोरां तेरे उते सूटीया

तनु हां मैं मंदा सइया पूठियाँ भी तू सिद्धियां पाइयाँ,

धुनें वालेया होइया दुखा दियां छुटियाँ,

पोणाहारीया डोरां तेरे उते सूटीया

जद बाबा तू मौज च आवे राज फकीरा तो करवावे,

गुफा वलैया तू ता गंड दा है जूतियां,

पोणाहारीया डोरां तेरे उते सूटीया

रोज आते बलिहारी जोगियां,

हूँ करदे एही पुकार जोगियां,

चिमटे वलियाँ हरियाँ कर वेला सुखियाँ,

पोणाहारीया डोरां तेरे उते सूटीया

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।