सत्संग वो गंगा है इस में जो नहाते है

पारंपरिक
माँ गंगा भजन विविध भजन ganga
॥ पावन पाठ ॥

सत्संग वो गंगा है इस में जो नहाते है,

पापी से पापी भी पावन हो जाते है,

ऋषियों ने मुनियो ने इसकी महिमा गाई.

सत्संग ही जीवन है ये बात है बतलाई.

ये वेद बताते है ये रंक बताते है,

पापी से पापी भी पावन हो जाते है,

वचनो के मोती है संगत के सागर है,

फल ही फल मिलते है सुख के इस पल बर में,

इस ज्ञान के सागर में जो दुब्बकी लगाते है,

पापी से पापी भी पावन हो जाते है,

इस तीर्थ से बढ़ कर कोई तीर्थ धाम नहीं,

दुःख कलेश संकट का यहाँ कोई काम नि,

आते है जगत में जो जीवन को संजोते है,

पापी से पापी भी पावन हो जाते है,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।