मत इतराओ मन वनवारे के

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॥ पावन पाठ ॥

मत इतराओ मन वनवारे के इक दिन सब मिट जाना है,

आये जिस दिन प्रभु की पुकार हमे जग छोड़ के जाना है,

मत इतराओ मन वनवारे के...

ये तेरी काया ये तेरी माया कुछ भी न हर दम रहे गा,

बीता समय तो यो तेरे प्यारे कोई न साथी बने गा,

तू अकेला ही आया था अकेला ही तुझे जाना है,

मत इतराओ मन वनवारे के......

कितने यत्न से कितनी लग्न से जग अपना तूने सजाया,

सचाई जीवन की कड़वी बहुत है क्यों ये समझ न पाया,

जो आज ये तेरा है वो कल दूजे का हो जाना है,

मत इतराओ मन वनवारे के.....

नेकी के पथ पे तू चल के रही दुनिया को अपने सजा ले,

जीवन का मतलब एक है प्यारे सबको को तू अपना बना ले,

यही नेकी तेरी अंकुश करे गा जमाना है,

मत इतराओ मन वनवारे के.........

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।