मैं की की वर्ण कराँ पति जी बहुत हमारे तंगी

पारंपरिक
श्री कृष्ण भजन कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

विप्र दी पत्नी जी कहन्दी जोड़ के हत्थ प्यारे,

घर विच ग़रीबी है हुन नी जांदे दुःख सहारे,

अज्ज छेवां दिन होया रोटी खादी नू इक डंगी,

मैं की की वर्ण कराँ पति जी बहुत हमारे तंगी.......

फिकराँ दी गल्ल नहीं आपे करनगे फिकर मुरारी,

ओह फिकर नाल देवे लै के खांदी दुनियां सारी,

है भोग पतिप्रथा प्यारिये क्यों कीती दिलगिरी,

क्यों फिकर करें पत्नी लिखी नहीं कर्मा विच अमीरी.......

जद रात नूँ सोन्दी हा दिसदे छत दे विच दी तारे,

घर हवा आवणे नूँ दिसदे मोगरे बहुत हमारे,

कल कणीयां दे विचों डिग्गी चूहे सणे भुजंगी,

मैं की की वर्ण कराँ पति जी बहुत हमारे तंगी.......

इस जगत क्यारी चों सोई मिलन कर्म जो बीजे,

दस्स मिलन अनार किवें पिछ्ले जनम रिंड सी बीजे,

अज्ज फुलवाड़ी हुन्दी जे बीजी हुन्दी पुंन पनीरी,

क्यों फिकर करें पत्नी लिखी नहीं कर्मा विच अमीरी.......

कल्ल पुत्र तेरे ने खूण्डी मार भन्नता तौड़ा,

हुन किस विच नीर भरां पाता होर नवां इक पौड़ा,

नित नित ना जांदी है पति जी चीज़ गवांडो मंगी,

मैं की की वर्ण कराँ पति जी बहुत हमारे तंगी.......

जो चाहे मालिक नी पल विच धन दे ढेर लगादे,

ओहनां धन दे ढेरां नूँ चाहे पल विच ख़ाक बनादे,

ओहदी ताकत दे मूहरे नहीं चलदी मेरी मेरी,

क्यों फिकर करें पत्नी लिखी नहीं कर्मा विच अमीरी.......

तुसी मौड़ा पाउंदे नी रहन्दे नाल साधुआँ भाउंदे,

मैं किवें विराजां जी पिछों रहन्दे बाल सताउंदे,

घर दी पुंज लाचारी तों दुःखी है सेवक की अर्धांगी,

मैं की की वर्ण कराँ पति जी बहुत हमारे तंगी.......

जे घर च गरीबी है तां ही है हरि चरणों में प्रीति,

इस धन दे कारण ही सुर्ती धर्म कर्म तों गिरती,

जो भगवान याद रहे, ना रहे धन दी कदे फकीरी।

क्यों फिकर करें पत्नी लिखी नहीं कर्मा विच अमीरी.......

हो कुड़ी जवान गई अगले रिश्ता ना लैंदे संगदे,

इस जगत क्यारी चों पुत्रां वाले सौ सौ मंगदे,

इस लोक प्रथा ने जी दूजी जान सूली ते टंगी,

मैं की की वर्ण कराँ पति जी बहुत हमारे तंगी.......

मैथों मंगेया जाना नीं जाके श्याम मित्र दे द्वारे,

की लैके आया ताऊ पुछणगे बाल प्यारे,

कुर्ता फटेया होया नीं धोती हैगी लीरो लीरी,

क्यों फिकर करें पत्नी लिखी नहीं कर्मा विच अमीरी.......

पंडित देव शर्मा बृजवासी

श्री दुर्गा संकीर्तन मण्डल

रानियां (सिरसा)

7589218797

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प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।