रेहमता नाल झोलियाँ भर दितिया

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॥ पावन पाठ ॥

पौणाहारी दूधाधारी दी मेरे मन न मूरत माह गई है,

रेहमता नाल झोलियाँ भर दितिया बाबे दी किरपा हो गई है

दर दर ते धक्के खादे सी कोई सुन दा न सी अर्ज मेरी,

मेहनत दा मूल न मिलदा सी सब कर दे सी हीरा फेरा,

होगी निगा सवाली योगी दी तकदीर साड़ी चंगी हो गई है,

रेहमता नाल झोलियाँ भर दितिया बाबे दी किरपा हो गई है

जड़ो वक़्त बड़लिया बेब ने सब लैन सलाहवा आउंदे ने,

ओहि करा फैसले स्थ विच मैं ओ सब दे मन न भौंदे ने,

कारा कोठियां दितिया बाबे ने रिद्धि सीधी कॉल ख्लो गई है,

रेहमता नाल झोलियाँ भर दितिया बाबे दी किरपा हो गई है

सपने विच दर्शन दे दिते बाबे ने कर्म कमाया है,

किरपा नाल जापी आटे वाला आज चारे पास छाया है,

सच आखे रवि मठठिया दा मेरी रूह जोगी विच खो गई है,

रेहमता नाल झोलियाँ भर दितिया बाबे दी किरपा हो गई है

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।