रब दी रजा दे विच राजी रहना सिख ले

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॥ पावन पाठ ॥

रब दी रजा दे विच राजी रहना सिख ले,

हर वेले उस दा तू नाम लेना सिख ले,

रब दी रजा दे विच राजी रहना सिख ले,

उसने जो दित्ता ओहदा शुक्र मनाई जा,

शाम ते सवेरे गुण उस दा तू गाई जा,

तेरा भाना मीठा लागे केहना बंदे सिख ले,

रब दी रजा दे विच राजी रहना सिख ले,

हनेरिया तूफान वाला भावे रहे झुल्दा,

श्रदा न मन जेहड़ा कदी नहीं रुलदा,

नाम दे समन्दरा च वेहना बंदे सिख ले,

रब दी रजा दे विच राजी रहना सिख ले,

किरपा सतगुरु दी नहियो ओ जांदा,

की है तेरे मन च ओ सब कुछ जांदा,

वाहेगुरु बोल ओहदे चरनी तू टिक ले,

रब दी रजा दे विच राजी रहना सिख ले,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।