हे मेरे गुरुदेव करुणा सिंधु करुणा कीजिए

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॥ पावन पाठ ॥

हे मेरे गुरुदेव करुणा,सिंधु करुणा कीजिए,

हूं अधम आधीन अशरण, अब शरण में लीजिए,

खा रहा गोते हूं मै, भव सिंधु के मझधार मैं,

आसरा है दूसरा कोई न,अब संसार में,

हे मेरे गुरुदेव करुणा,सिंधु करुणा कीजिए,

हूं अधम आधीन अशरण, अब शरण में लीजिए,

पाप बोझे से लदी नैया, भंवर में जा रही ,

नाथ दौड़ो अब बचालो, जल्दी डूबी जा रही ,

हे मेरे गुरुदेव करुणा,सिंधु करुणा कीजिए,

हूं अधम आधीन अशरण, अब शरण में लीजिए,

आप भी यदि छोड़ देंगे, फिर कहां जाऊंगा मैं,

भव सागर को नाथ कैसे , पार कर पाऊंगा मैं,

हे मेरे गुरुदेव करुणा,सिंधु करुणा कीजिए,

हूं अधम आधीन अशरण, अब शरण में लीजिए,

सब जगह मंजिल भटक कर अब शरण ली आपकी,

पार करना या न करना, दोनों मर्जी आपकी ,

हे मेरे गुरुदेव करुणा,सिंधु करुणा कीजिए,

हूं अधम आधीन अशरण, अब शरण में लीजिए,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।