पौणाहारी सिर उते हथ धरदा

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॥ पावन पाठ ॥

पौणाहारी जोगी मेरे सच्ची ने कमाल,

लगे जेहड़े चरनी ते होंगे ने निहाल,

दिन रात जोगी दे गुण गाउँदा रह,

योगी भी हमेशा तेरे रहुगा पख दा,

उस बंदे कोलो दुःख दूर रेहन सारे,

पौणाहारी सिर उते हथ धरदा.....

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भव सागरा च योगी पार भी लगाउँदै ने,

सुते होये भागा नु एह बाबा जी जगाउंदे ने,

छड़ के तू दुनिया नु चरना च आजा,

दूधाधारी सरिया दी बाह फड् दा,

पौणाहारी सिर उते हथ धरदा,

इक मन होके जेहड़ा इस दर आया है,

बाबा जी कुली दी था महल भी बनाया है,

केहड़े केहड़े दसा ेहड़े कोटक न्यारे,

जंदा नहीं निराश एथो झोली भरदा,

पौणाहारी सिर उते हथ धरदा,

इस दुनिया दी कोई चीज नहीं न्यारी,

योगी झोली पाउँदा नवी नैंसी प्यारी,

टूथ पूठ धन नाल भर दू खजाने हर वाजी जीतदा नहियो हरदा,

पौणाहारी सिर उते हथ धरदा,

हाथ रखी सैयां हुन करि न तू दूर नहीं,

सनी कदे कदे हो जांदा मजबूर जी,

सुमन नु लब दी न दर बिना तोई,

घर पैसिया तो बिना नहीं सरदा,

पौणाहारी सिर उते हथ धरदा,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।