पौणाहारी दे द्वारे मेरा जी लगदा

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॥ पावन पाठ ॥

पौणाहारी दे द्वारे मेरा जी लगदा,

दूधाधारी दे दवारे मेरा जी लगदा,

सोहना योगी दा द्वारा एथे ही लगदा,

पौणाहारी दे द्वारे मेरा जी लगदा,

दुःख हर दे कर दे मेहरा तू,

हूँ आजा लाइयाँ देरा क्यों,

चढ़ के चड़ाईया पौणाहारी दर ाइयाँ,

तनु मन च वसा के मन ही लगदा,

पौणाहारी दे द्वारे मेरा जी लगदा,

तनु अखियां विच वसा लेना,

तेरे दर तो तनु पा लेना,

ऐसी भगता ने डोर ले आ तेरे नाल जोड़,

पौणाहारी न मनाउंदे मूल की लगदा,

पौणाहारी दे द्वारे मेरा जी लगदा,

पौणाहारी कर्म कमाया है,

संग चल के द्वारे आया है,

हूँ सुन फर्यादा खोल साड़ियां किताबा,

साढ़े लेखा दी लिखे विच की लगदा,

पौणाहारी दे द्वारे मेरा जी लगदा,

रंग नैंसी ताहि चढ़ा देयो जी,

जो सुमन मंगे झोली माँ देओ जी,

तेरा बछड़ा प्यारा नवी तक दा सहारा,

तेरे नाम तो बगैर मन नहीं लगदा,

पौणाहारी दे द्वारे मेरा जी लगदा,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।