पौणाहारी ने बचाया मेरी बांह फड्

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॥ पावन पाठ ॥

अध् विचकार गोते पेया खावा,

लभे न किनारा मैं ता डुब्दा ही जावा,

पौणाहारी नू ध्याया उसे था खड़के,

मेरे दाते ने बचया मेरी बांह फड् के,

लभे न किनारा मैं ता डुब्दा ही जावा,

पौणाहारी तेरे वाजो कीहनु मैन धयावा,

मेरी सुन ली पुकार आ गये ता करके,

पौणाहारी ने बचाया मेरी बांह फड् के

अखा मोरे मेरे सी हनेरा जेहा छा गया,

डरन दी लोड नहीं जोगी समजा गया ,

पेंदी बचया दी भीड़ आउंदे ता करके,

पौणाहारी ने बचाया मेरी बांह फड् के

डुबदे नु बस पौणाहारी दा सहारा,

बाहो फड़ कद लिया वेखिया नजारा,

मैनु सीने नाल लाया उता ता करके,

पौणाहारी ने बचाया मेरी बांह फड् के

बाबा जी बकाया आज मौजा मान दा,

सनी सुमन नैंसी ते नवी दर आवदा,

मेरा गौंडा परिवार ता करके,

पौणाहारी ने बचाया मेरी बांह फड् के

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।