मैं कुज नहीं सी मैं कुज नहीं

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॥ पावन पाठ ॥

मैं कुज नहीं सी मैं कुज नहीं सी मैनु चरनी लगाया बाबे ने,

मैं कुज नहीं सी मैं ते कर्म कमाया बाबे ने,

इस दुनिया तो तुर चल्या सी बाहो फड़ बिठाया बाबे ने,

मैं कुज नहीं सी मैं कुज नहीं सी मैनु चरनी लगाया बाबे ने,

बड़े ज़िंदगी दे विच दुःख आये पर मैं कदे भी डोलिया न,

पूरा विश्वाश सी बाबे ते मंदा किसे न बोलियां ना,

मेरी जान दे वैरी दुश्मना तो मैनु आप बचाया बाबे ने,

मैं कुज नहीं सी मैं कुज नहीं सी मैनु चरनी लगाया बाबे ने,

कुज ओ दाने भी उग पेंदे जग जोगी महरा करदा है,

मंगन दी लोड नहीं पेंदी आप ही झोलियाँ भरदा है,

मेरी दुभ्दी जांदी वेहड़ी न पार लगाया बाबे ने,

मैं कुज नहीं सी मैं कुज नहीं सी मैनु चरनी लगाया बाबे ने,

ऐसी नाम ओहदे दी ज्योत जगा के मंदिर दे विच बहने आ,

हर काम करण तो पहला जय बाबे दी कहने आ,

सोनी पटी वाले न स्वर्ग दिखाया बाबे ने

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।