पाके घुंगरू नचू गी नचूगी द्वारे सैयां दे

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॥ पावन पाठ ॥

रब दी रूह दे नो दरवाजे दसवा गुप्त बनाया,

उस गली दी सार न मैं जाना जिथे यार समाया,

मैं दीवानी यार दी होई अखा ओहदे नाल लाइयाँ ने,

पाके घुंगरू नचू गी नचूगी द्वारे सैयां दे,

हर कोई एथे आशिक़ बनया झूठा इश्क़ कमावे,

कोई न जाने फर्क इश्क़ दा कोई न फ़र्ज़ निभावे,

ओह मेरा मैं ओह्दी होई फिरा वांग शुदाइयाँ दे,

पाके घुंगरू नचू गी नचूगी द्वारे सैयां दे,

पेंडे लम्हे इश्क़े दे घर कोइर सुनी दे यारा,

ओह मंजिल नु तेह कर लेंदे यार दा मिले सहारा,

भूले शाह रब मिलदा ओहनू जिह्ना सख्त कामिया ने,

पाके घुंगरू नचू गी नचूगी द्वारे सैयां दे,

होश रही मैनु कोई रब दे दर्शन पाके,

जलवाने दा भूटा कहंदा दर सैयां दे जाके,

लाड़ी शाह ने पागल किता अखा जदो दी लिया ने,

पाके घुंगरू नचू गी नचूगी द्वारे सैयां दे,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।