बहे सत्संग का दरिया

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॥ पावन पाठ ॥

बहे सत्संग का दरिया,

नहा लो जिस का जी चाहे,

करो हिमत लगा डुबकी,

नहा लो जितना जी चाहे,

बहे सत्संग का दरिया

हज़ारो रतन है इसमें इक से इक बड़याला,

नहीं कोई दर बीमारी का लगा लो जितना जी चाहे,

बहे सत्संग का दरिया.........

खजाना वो मिले इसमें नहीं मुंकिन ज़माने में,

किसी का डर नहीं कुछ भी उठा लो जितना जी चाहे,

बहे सत्संग का दरिया...

मिटे संसार का चकर लगे नहीं मौत की टकर,

करे है भव सागर करा लो जिसका जी चाहे,

बहे सत्संग का दरिया......

बना दे चोर से साधु मिटावे दुष्ट मन की,

कटे जड़ मूल पापो का कटा लो जिसका जी चाहे,

बहे सत्संग का दरिया

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।