साई सुन ले मेरे दिलदार नहीं सहनी जुदाई

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॥ पावन पाठ ॥

अब जीना है दुश्वार तेरे बिन साई,

साई सुन ले मेरे दिलदार नहीं सहनी जुदाई,

जब थाम को इक रात क्यों दुरी बड़ाई

साई सुन ले मेरे दिलदार नहीं सहनी जुदाई,

तेरे बिना हर पल मेरा दिल यु जलता है,

सेह्ता रहे सितम तो पत्थर भी पिगलता है,

जब कही राहो में मुझको अक्ष तेरा मिलता है,

तेरा ये दीवाना अब तो उस तरफ ही छिलता है,

कर खुद से ही तकरार तेरी याद यु आई,

साई सुन ले मेरे दिलदार नहीं सहनी जुदाई,

गमो ने लुटा जैसा जैसे लुटे इक दरिंदा है,

ज़िंदगानी अब तो मेरी मुझसे शर्मिंदा है,

जी रहा हु जैसे कैद में परिंदा है,

धड़कने तो रुक गई कब की सांसे ये जिन्दा है,

सुन जखमो को हर बार क्या सजा है पाई,

साई सुन ले मेरे दिलदार नहीं सहनी जुदाई,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।