तेरा लख लख शुक्र मानने

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

तेरा लख लख शुक्र मानने आ तेरा ही दिता खाने आ,

तू सी जद भी भुलांदे हो गुरु जी ऐसी दौड़े दौड़े आउंदे आ,

तेरा लख लख शुक्र मानने आ तेरा ही दिता खाने आ

तेरा इक इशारा मेरे गुरु जी मुर्दे विच जीवन पा देवे,

तेरी किरपा नल मेरे गुरु जी गूंगा भी वेद सुना देवे,

तुसी मन मर्जी दे मालिक हो ऐसी टोहड़ा हुकम बजाओने आ,

तेरा लख लख शुक्र मानने आ तेरा ही दिता खाने आ,

असि द्वार तेरे दे मंगते हां सेवक हा सेवा दारा दे,

तुहाडी किरपा ते ही पलदे हां भूखे हां तेरे प्यारा दे,

आसि द्वार तेरा कदे छड़ना नहीं ,

साहनु पता आसि निमाने आ,

तेरा लख लख शुक्र मानने आ तेरा ही दिता खाने आ

मैं ते मेरा परिवार गुरु जी तेरा जन्मा दा करजाई है,

साड़ी शान मान सन्मान है तू साडी तूद्दे नाल वड़्याई है,

मैनु ता सहारा तेरा है तेरा ही आसरा चाहने हां,

तेरा लख लख शुक्र मानने आ तेरा ही दिता खाने आ

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।