माँवा ठण्डीयाँ छाँवा आखण तती हवा ना लगे

नरेन्द्र चंचल
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॥ पावन पाठ ॥

माँवा ठण्डीयाँ छाँवा

आखण तती हवा ना लगे

मै लाल तो सदके जाँवा

माँवा ठण्डीयाँ छाँवा

सदा भला बचिया दा चाहवे दुःख सेह के ओ सुख पोहनचावे,

दिगड़े तेहंदे मूरख न भी दसदि सिध्दियां राहवा,

माँवा ठण्डीयाँ छाँवा ....

माँ दी सेवा रब दी पूजा माँ ही रब दा नाम है दूजा,

माँ दा द्वारा छड़ के पगले क्यों भटके होर थावा,

माँवा ठण्डीयाँ छाँवा......

माँ ऋण कोई ला नहीं सकदा कोई उपकार भुला नहीं सकदा,

स्वर्ग कीह्नु कहन्दे ओ माँ दे चरना दा परषावा,

माँवा ठण्डीयाँ छाँवा......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।