शिरड़ी न आऊ तो जी गबराता है

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॥ पावन पाठ ॥

शिरड़ी न आऊ तो जी गबराता है,

ये तेरी किरपा है तू ही भुलाता है,

शिर्डी आकर दिल को मेरे चैन आता है,

शिरड़ी न आऊ तो जी गबराता है,

चाँद हो या तारे या फूल तारे लगते नही है अब मुझको प्यारे,

जब से निहारी सूरत तुम्हारी चड़ने लगी साईं नाम की खुमारी,

ये तेरा मुखड़ा ही मुझको भाता है,

देख के तुझको मन को मेरे चैन आता है,

शिरड़ी न आऊ तो जी गबराता है,

नाम कोई मुश्किल ना कोई उज्लन,

भागे उदासी बोजिल न हो मन,

आके यहाँ मैं तुझमे खो जाता तुझे देख कर मेरा मन मुश्करता,

मुझपे तो बाबा तू प्यार लुटाता है,

देख के तुझको मन को मेरे चैन आता है,

शिरड़ी न आऊ तो जी गबराता है,

जब से मिला है शिरडी का द्वारा तब से बना मैं सब का ही प्यारा,

आनदं ही आनदं मिलता यहाँ है शिरडी सी मस्ती और कहा है,

इसलिए रणजीत तेरे दर पे आता है,

देख के तुझको मन को मेरे चैन आता है,

शिरड़ी न आऊ तो जी गबराता है,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।