एह मेरे गुरु जी एह मेरे मालिक

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॥ पावन पाठ ॥

एह मेरे गुरु जी एह मेरे मालिक दात बस यही मांगू तुझसे,

तेरी ही राह चलता राहु सदा,

मुझे ऐसी जनूनी बंदगी दे दे,

तेरी रजा में राजी रहे सदा,

ऐसी रूब रूह रोशनी दे दे,

दुःख हो तो न कभी गिल्ला करू,

मुश्किलों से ना कभी हिला करू ,

सुख मिले जब किरपा से तेरी मालिक तुझे कभी न भुला करू,

हर शह में देखलु नूर तेरा काबिल ऐसी मुझे निगहा देदे,

एह मेरे गुरु जी एह मेरे मालिक दात बस यही मांगू तुझसे,

गम में पराये कभी न हसा करू,

दूजे की ख़ुशी से ना जला करू,

कर पाउ अगर मदत सब की,

दर्द न दू कर सकू तो भला ही करू,

खुदा को देख लू वसा बरसु काबिल मुझे ऐसी निगाह देदे,

एह मेरे गुरु जी एह मेरे मालिक दात बस यही मांगू तुझसे,

माया के जाल में ना फसा करू,

सच की राह से ना हटा करू,

बक्शे है फ़र्ज़ जो दाता सदा नेक नियत से उन्हें अदा करू,

खुद को ना मानु तुझसे जुड़ा मेरे जेहन को ये यकीन देदे,

एह मेरे गुरु जी एह मेरे मालिक दात बस यही मांगू तुझसे,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।