इबादत कर इबादत करण दे नाल गल बंदी एह

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॥ पावन पाठ ॥

इबादत कर इबादत करण दे नाल गल बंदी एह,

किसे दी आज बंदी है किसे दी कल बंदी है,

ऊंची सोच सेर नीवा रखी यार तू क्यों के,

एह सागर जिह्ना गहरा ओहनू ही शल बंदी है,

इबादत कर इबादत करण दे नाल गल बंदी एह,

क्यों हंकार करदा है इक दिन खाक हो जाना,

तेरे तो जानवर चंगे जिह्ना दी खल बंदी है,

इबादत कर इबादत करण दे नाल गल बंदी एह,

के पीतल ओ भी है जीहदे तो तीखे हथ्यार बंदे ने,

पर ओ असल पीतल जो मंदिर दा टल बंदी है,

इबादत कर इबादत करण दे नाल गल बंदी एह,

जे कर मुश्किला आवन तेरे रस्ते तू डोली न,

कई वारि मुसीवत भी दुखा दा हल बंदी है,

इबादत कर इबादत करण दे नाल गल बंदी एह,

इक वरि जरा दिल नल तू अरदास ता कर वे,

के देखि फिर तेरी गल उसे पल बंदी है,

इबादत कर इबादत करण दे नाल गल बंदी एह,

एहना रास्तेया सतिंदरा तनु पार नहीं लाना,

ओहि पग ढांड खड़ जेहड़ी गुरा दे वाल बंदी है,

इबादत कर इबादत करण दे नाल गल बंदी एह,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।