आजा तु पहाड़ छोड़ के

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

मंदिरो में रहती हो रूप सोना सोना है,

मइया तेरी आँखों में प्यार थोड़ा थोड़ा है,

विनती करू दोनों हाथ जोड़ के,

आजा आजा मेरे घर तू पहाड़ छोड़ के,

तुझपे मैं वारु सो ज़िंदगानी,

हर पल की घड़ियाँ तेरे नाम की है,

जब मेरी आवाज तुझ तक न पहुंचे फिर मेरे ये जुबा किस काम की है,

माता और बेटी की कैसी ये कहानी है,

खुशीओ का मौका और अँखियो में पानी है,

अंसियो की लड़ियो को आज तोड़ के,

आजा तु पहाड़ छोड़ के.....

सावन के झूलो ने भेजा भुलावा अब के बरस इनकी किस्मत जगा जा,

कजरे के सुर ताल फीके है मइया बन के झंकार तू इस में समा जा,

मन के शिवाले में तेरा ही बसेरा है,

तुझसे ही रात है तुझसे ही सवेरा है,

आस से हमारा विश्वाश जोड़ के,

आजा तु पहाड़ छोड़ के

मुझको छुपाया है आंचल में अपने देखे है मैंने बहुत ऐसे सपने,

आती नहीं माँ तू जिद पे अडी है,

चरणों की धूल तेरे माथे पे सजा लुंगी आज नहीं तो कल तुझको भुला लुंगी,

चल दूंगी वर्ण जहां छोड़ के,

आजा तु पहाड़ छोड़ के

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।