मेरा कुज भी नहीं मेरा कुज भी नहीं सब तेरा तेरा दातिए,

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

असि कुज भी नहीं कुज भी नहीं कुज भी नहीं दातिए.

सब तू ही तू सब तू ही तू एह दातिए,

तेरे दर ते झुक्दे देवी देव ते शेरावालिये,

मेरा कुज भी नहीं मेरा कुज भी नहीं सब तेरा तेरा दातिए,

तू चावे ता राजिये नु भी दर दर भीख मंगा देवे,

तेरी किरपा मंग तेया नु भी तख्ता ऊठे बिठा देवे,

अकबर वर्गे राजे तेरे तरल करदे दातिए,

मेरा कुज भी नहीं मेरा कुज भी नहीं सब तेरा तेरा दातिए,

सूरज चन दरया धरती तेरा पानी भरदे ने,

एह अम्ब्रा दे तारे भी माँ तनु सजदा करदे ने,

तेरी किरपा दे नाल गूंगे गल्ला करदे दातिए,

मेरा कुज भी नहीं मेरा कुज भी नहीं सब तेरा तेरा दातिए,

कई खांडे ने राज के रोटी कई भूखे ही सोन्दे ने,

कई कमान दे लाख करोडा कई कखा नु रोंदे ने,

सुरज शाम आते लकी बस हूँ एही कहन्दे दातिए,

मेरा कुज भी नहीं मेरा कुज भी नहीं सब तेरा तेरा दातिए,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।