आओ जी आओ गुरु जी आओ

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

आओ जी आओ गुरु जी आओ,

ना होर तरसाओ के दरस दिखाओ गुरु जी आओ जी,

आओ जी आओ गुरु जी आओ,

एक एक पल गुरु जी तुम बिन सालो जैसा लगता,

इन आखियो को गुरु जी तुम बिन और न को जचता,

मेरे सुने मन मंदिर में आके फेरा पाओ जी,

आओ जी आओ गुरु जी आओ....

जब तक प्राण है गुरु जी तुम को हर पल मैं ध्याऊ,

स्वास स्वास में तुम को सिमरु दर्श तुम्हारा पाउ,

मेरे साथ मिल कर तुम भी गुण गुरु के गाओ जी,

आओ जी आओ गुरु जी आओ

ध्यान करू मैं मगन रहु मैं चरणों में तुम्हारे,

तुम ही तुम हो और नहीं कोई नैनो में हमारे,

झलक दिखाओ पास भुलाओ और न अब तरसाओ जी,

आओ जी आओ गुरु जी आओ

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।