तेरे दर दी कमली हो जावा

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

तेरे दर दी कमली हो जावा,

तनु पाके मैं ता खो जावा मैं खो जावा,

तेरे दर दी कमली हो जावा,

मेरे मुरशद न मैं की आखा,

मैं जो पावा उस तो पावा,

मैं झूठे जग तो की लेना की लेना मैं की लेना,

तेरी किरपा गुरु जी पा जावा,

तनु पाके मैं ता खो जावा मैं खो जावा,

तेरे दर दी कमली हो जावा...

इस प्रेम प्याले विच सतगुरु मैनु नाम दा अमृत पा देना,

नशा प्यार दा चढ़ जावे मैनु मैं तेरे विच ही मिल जावा,

तनु पाके मैं ता खो जावा मैं खो जावा,

तेरे दर दी कमली हो जावा,

मैं पा जावा उस मंजिल नु,

जिथे मेरा सोना माहि वसदा तेरे दर दी जोगन बन जावा,

तनु पाके मैं ता खो जावा मैं खो जावा,

तेरे दर दी कमली हो जावा,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।