मन मेरिया तू निवा होके जीवी

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॥ पावन पाठ ॥

मन मेरिया तू निवा होके जीवी कदे भी हंकार ना करि,

सोच ऊंची ते नजर रख निवि कदे भी हंकार न करि,

नीवे पेड़ ही फल दे फूलदे कहन्दे लोक सयाने,

अकड़े पास ते कुज नहीं लगदा फल दा फूल ना जाने,

धोखे अमृत दे ज़हर न तू पीवी कदे भी हंकार ना करि,

मन मेरिया तू निवा होक जीवी कदे भी हंकार ना करि,

दुर्गत हुंडी आखिर इथे ओथे मगरूर दी,

सेवक बनके सेवा करिये दुखियाँ मजबुरा दी,

फट नीविया दे निवा होक सीवी कदे भी हंकार ना करि,

मन मेरिया तू निवा होक जीवी कदे भी हंकार ना करि,

जे कोई मंदा बोले उस न मंदा बोल न बोली,

अपने मानव जन्म न एवे पशुया नाल न तोली,

चंगा होक एवे मंगड़ा ना जीवी कदे भी हंकार न करि,

मन मेरिया तू निवा होक जीवी कदे भी हंकार ना करि,

सुख भी उसदे दुःख भी उसदे मैं मैं करिये काहदी,

साहिल करले अपने आप न उसदी रजा विच राजी,

घुट सबर ते शुक्र दा पीवी कदे भी हंकार न करि,

मन मेरिया तू निवा होक जीवी

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।