क्या लेके आया बंदे

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॥ पावन पाठ ॥

क्या लेके आया बन्दे,

क्या लेके जायेगा,

दो दिन की जिन्दगी है,

दो दिन का मेला॥

ईस जगत सराऐ में,

मुसाफीर रहना दो दिन का,

क्यों विर्था करे गुमान,

माया धन काया जोबन का,

नहि है भरोसा पल का,

जग माटी का ढेला,

दो दिन की जिन्दगी है,

दो दिन का मेला ॥

वो कहाँ गऐ बलवान,

तीन पग धरती तोलणियाँ,

जिनकी पड़ती धाक नहि,

कोई शामें बोलणियाँ,

निर्भय डोलणियाँ नर,

गया वो अकेला,

दो दिन की जिन्दगी है,

दो दिन का मेला ॥

तू छोड़ सके ना बंदे,

माया गिणी गिणाई ने,

गढ कोटा की निव छोड या चिणी चिणाई ने,

मिनी तो मनाई बन्दा यही छोड़ जाये गा

दो दिन की जिन्दगी है,

दो दिन का मेला ॥

ईस काया का है भाग,

भाग बिन पाया नहीं जाता,

कर्मा बिना नसिब तोड़,

फल खाया नई जाता,

कहे सत्य नाम जग ये,

झूठा झमेला,

दो दिन की जिन्दगी है,

दो दिन का मेला ॥

क्या लेके आया बन्दे,

क्या लेके जायेगा,

दो दिन की जिन्दगी है,

दो दिन का मेला ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।