सतगुरू मारी नाव

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

भरोसे आपके चाले जी,

सतगुरू मारी नाव,

सतगुरू मारी नाव,

दाता सतगुरू मारी नाव,

भरोसे आपके चले जी,

सतगुरू मारी नाव,

न तो मारे कुटुम्ब कबीलो,

न मारे परिवार गुरासा,

आप बिना नही दिखे जग में,

दुजो तारणहार,

भरोसे आपके चले जी,

सतगुरू मारी नाव,

बहुसागर तो उँडा घणा च,

नहीं पायो वाको पार गुरासा,

अरज करु आपसे रे,

लगाजो भव से पार,

भरोसे आपके चले जी,

सतगुरू मारी नाव,

कोढी कोढी माया जोड ली,

जोडी लाख हजार गुरासा,

चार दन की चाँदनी रे,

पाछे वाही अँधेरी रात,

भरोसे आपके चले जी,

सतगुरू मारी नाव,

अडसठ तीर्थ गरूचरणा में,

चारो धाम बताया,

गरु नाम का खाया झकोला,

वाही बैठ के नाया,

भरोसे आपके चले जी,

सतगुरू मारी नाव,

भरोसे आपके चाले जी,

सतगुरू मारी नाव,

सतगुरू मारी नाव,

दाता सतगुरू मारी नाव,

भरोसे आपके चले जी,

सतगुरू मारी नाव,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।