अंतरयामी नू दसा कि हाल दिल दा

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॥ पावन पाठ ॥

अंतरयामी नू दसा कि हाल दिल दा,

गुरु जी प्यारे नु दसा की हाल दिल दा,

मेथो वध एहनु पता मेरी मुश्किल दा,

दुगरी वाले नु दसा की हाल दिल दा,

गुरु जी प्यारे नु दसा की हाल दिल दा,

मैं तो वध एहनु पता मेरी मुश्किल दा,

दुगरी वाले नु दसा की हाल दिल दा,

गुरुमत इक रास्ता है ते गुरु सिख राही एह,

एहनु ध्यान दे पैर मिले हंकार मनाई ऐ,

इस रस्ते ते लगदा है पता अपनी मंजिल दा,

गुरु जी प्यारे नु दसा की हाल दिल दा,

दुःख हॉवे गुरमत दी एह मन खुश रेह्न्दा है,

भूख ही मिट जावे ता मन एह कहंदा है,

हूँ पहले वाला क्यों भला आनंद नहीं मिलदा,

दुगरी वाले नु दसा की हाल दिल दा,

गुरु जी प्यारे नु दसा की हाल दिल दा,

गुरु सिख नहीं डर सकदा दुनिया दी गला तो,

एह डर न किनारे ने सागर दिया छला तो,

तूफानी लहरा तो किनारा कदे नहीं हील्दा,

गुरु जी प्यारे नु दसा की हाल दिल दा,

मैं जिस कम आया सा ओह कम मुका बैठा,

हूँ जीने मरने दी चिंता ला बैठा,

चाकर बन के जीवा सदा,

इस दी महफ़िल दा,

गुरु जी प्यारे नु दसा की हाल दिल दा,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।