सुनले भजन मेरे भले सुर ताल हो न हो

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

सुनले भजन मेरे भले सुरताल हो न हो,

किस को खरब कि कल तेरा ये लाल हो न हो,

तेरी किरपा से ही मुझे दरबार ये मिला,

मेरे नसीब से चला बरसो ये सिलसिला,

किस्मत मेरी ऐसी ही तो हर साल हो न हो,

किस को खरब कि कल तेरा ये लाल हो न हो,

मन में उठे सवाल है कैसे दबाउ मैं,

दिल के मेरे जज्बात को गा के सुनाऊ मैं,

श्याद ये दिल में फिर कोई सवाल हो न हो ,

किस को खरब कि कल तेरा ये लाल हो न हो,

मेरी तो है औकात क्या मुझसे बड़े बड़े,

गाते हुए भजन तेरा दुनिया से चल पड़े,

सोनू मेरा भी कल वही हाल हो न हो,

किस को खरब कि कल तेरा ये लाल हो न हो,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।